General

Exclusive RSLP Project: अलवर की 175 KM नहर परियोजना – कब तक पूरा होगा, कितना मिलेगा मुआवजा, पूरी पड़ताल


RSLP Project in Alwar Rajasthan: अगर आप अलवर, खैरथल-तिजारा या राजगढ़ तहसील के निवासी हैं तो यह खबर आपकी जमीन, आपकी आर्थिकी और आपके भविष्य तीनों से जुड़ी है। रामजल सेतु लिंक परियोजना [ RSLP Project ] का वह अध्याय जो पिछले दो साल से कागजों तक ही सीमित था, अब धरातल पर उतरने को तैयार है। मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक 175 किलोमीटर लंबी इस नहर के लिए ड्रोन सर्वे का काम पूरा हो चुका है और जिला प्रशासन ने जमीन अलॉटमेंट की प्रक्रिया को अंतिम रूप देना शुरू कर दिया है। आइए, हम आपको बताते हैं कि इस महत्वाकांक्षी योजना का आपके जीवन पर क्या असर पड़ेगा।

मुख्य बिन्दु

ड्रोन सर्वे से क्या मिला? पूरा क्षेत्र अब डिजिटल मानचित्र में

नवंबर के पहले सप्ताह में ही पूरी हुई इस सर्वे प्रक्रिया ने नहर के मार्ग में आने वाले हर इंच जमीन को स्कैन किया है। सर्वे टीम ने जो हाई-रेजोल्यूशन मैप तैयार किया है, उसमें भू-आकृतियों से लेकर पहाड़, नदी, तालाब, आबादी और सरकारी भूमि का विस्तृत डिजिटल डेटा शामिल है।

एक वरिष्ठ अधिकारी ने हमें बताया की “अब हमें यह पता है कि कहां नहर बनाना आसान है और कहां चुनौतीपूर्ण” । इस डेटा के आधार पर तय होगा कि नहर किन हिस्सों से गुजरेगी, कौन-कौन सी जगह तकनीकी रूप से संवेदनशील हैं और किन स्थानों पर संरचनात्मक बदलाव की जरूत होगी। यानी अब कोई अनुमान नहीं, सबूतों और डेटा पर फैसले होंगे।

कितनी लागत और कब तक पूरा होगा काम?

पहले चरण में सिर्फ नहर निर्माण पर ₹3446 करोड़ खर्च होंगे। पूरी परियोजना का बजट ₹6492 करोड़ है। अब सवाल ये है कि यह रकम कहां से आएगी? अधिकारियों के मुताबिक, यह केंद्र और राज्य सरकार की संयुक्त परियोजना है, जिसमें Infrastructure Investment के तौर पर विभिन्न एजेंसियों से फंडिंग जुटाई जा रही है।

समयसीमा की बात करें तो, कार्यदायी एजेंसी को निर्माण कार्य साढ़े 4 साल में पूरा करना होगा। और यहां एक अहम बात – नहर का निर्माण करने वाली एजेंसी की 20 साल तक मेंटिनेंस की जिम्मेदारी रहेगी। यानी सिर्फ बनाकर जाने वाला ठेका नहीं, बल्कि लंबे समय तक जिम्मेदारी वाला मॉडल।

हमारे पत्रकारीय अनुभव में ऐसी शर्तें सिर्फ तभी रखी जाती हैं जब सरकार गुणवत्ता पर कोई समझौता नहीं करना चाहती। इससे भ्रष्टाचार के आसार कम होते हैं और काम की गुणवत्ता बेहतर होती है।

17 जिलों का पानी, एक परियोजना का खाका

Rajasthan water scheme के तहत इस परियोजना से प्रदेश के 17 जिलों को पानी मिलेगा। लिस्ट में जयपुर, झालावाड़, बारां, कोटा, बूंदी, सवाईमाधोपुर, दौसा, करौली, धौलपुर, भरतपुर, डीग, अलवर, खैरथल-तिजारा, कोटपूतली-बहरोड़, अजमेर, ब्यावर और टोंक शामिल हैं।

अलवर को मिलेगा 200 मिलियन क्यूबिक मीटर पानी। पहले चरण में सिर्फ पीने का पानी, दूसरे चरण में सिंचाई का भी। पानी आएगा करौली जिले के खुर्रा-चैनपुरा से, जो 150 किलोमीटर दूर है। नहर राजगढ़ की तहसील में प्रवेश करेगी, धमरेड़ बांध में जमा होगा, फिर नटनी के बारां में पहुंचेगी। वहां से दो लिंक नहरें निकलेंगी – एक जयसमंद बांध और दूसरी रूपारेल नदी के रास्ते घाट बांध तक।

जयसमंद बांध से आगे फिर दो नहरें – एक सिलीसेढ़ के लिए, दूसरी कृत्रिम बांध के लिए। यानी एक परियोजना, कई स्तर, और हर स्तर पर पानी की बांट। यह डिज़ाइन Water Distribution Network का एक अनोखा उदाहरण है।

किसानों की जमीन: अधिग्रहण कितना, मुआवजा कैसे?

अब आते हैं सबसे संवेदनशील मुद्दे पर – जमीन अधिग्रहण। अधिकारियों ने हमें बताया कि नहर मार्ग में आने वाले किसानों की जमीन का प्रस्ताव तैयार हो रहा है। कई इलाकों के पटवारियों ने अपनी रिपोर्ट सौंप दी है। जल्द ही कितनी जमीन लेनी है और कितने किसान प्रभावित होंगे, इसकी आधिकारिक रिपोर्ट जारी होगी।

एक वरिष्ठ राजस्व अधिकारी ने नाम न बताने की शर्त पर बताया, “हमारा लक्ष्य किसानों को नुकसान से बचाना है। इसलिए जहां संभव हो, नहर का रूट उनकी जमीन से बचाते हुए तय किया जा रहा है। जिनकी जमीन आ रही है, उन्हें सबसे पहले सूचित किया जाएगा।”

वन विभाग की जमीन के लिए ‘स्वैप डील’

संभावित रूट में वन विभाग की जमीन आने पर सरकार ने स्मार्ट समाधान निकाला है। जहां नहर वन क्षेत्र से गुजरेगी, वहां उसकी बराबर भरपाई के लिए वैकल्पिक भूमि देने की तैयारी है। यानी वन विभाग को उतनी ही जमीन कहीं और देकर कानूनी औपचारिकताएं पूरी की जाएंगी।

यह “स्वैप डील” मॉडल पर्यावरण कानूनों का पालन करने के साथ ही प्रोजेक्ट की रफ्तार बनाए रखेगा। अधिकारी बताते हैं कि इसके लिए पहले ही वन विभाग से समन्वय शुरू हो चुका है और जल्द ही जमीन की पहचान की जाएगी।

परियोजना का नाम: राजनीति या विकास की पहचान?

दिलचस्प बात यह है कि इस योजना का नाम तीसरी बार बदला गया है। पहले [ERCP project] (पूर्वी राजस्थान नहर परियोजना), फिर पार्वती-कालीसिंध-चंबल पूर्वी राजस्थान नहर परियोजना (PKC-ERCP) और अब रामजल सेतु लिंक परियोजना (Ramjal Setu Link Project)।

जनवरी 2024 में पहला बदलाव हुआ, फिर जनवरी 2025 में दूसरा। 15 सालों की पत्रकारिता में हमने देखा है कि नाम बदलने से ज्यादा महत्वपूर्ण परियोजना की साकारात्मक प्रगति है। नाम चाहे जो भी हो, अगर अलवर के खेतों तक पानी पहुंचता है तो वही विकास है।

आपके लिए क्या है प्रैक्टिकल वैल्यू?

अगर आप अलवर या आस-पास के किसी भी जिले में रहते हैं, तो इस परियोजना का सीधा मतलब है:

  1. पानी सुरक्षा: पीने के पानी की स्थायी व्यवस्था
  2. कृषि: दूसरे चरण में सिंचाई सुविधा से खेती की लागत घटेगी
  3. रोजगार: निर्माण के साढ़े 4 साल में हजारों की नौकरी
  4. संपत्ति मूल्य: नहर के पास जमीन की कीमत बढ़ सकती है

लेकिन एक चेतावनी भी – जिनकी जमीन अधिग्रहण में आएगी, उन्हें तुरंत कृषि विभाग या राजस्व कार्यालय में संपर्क करना चाहिए। अपने दस्तावेज अप-टू-डेट रखें और किसी भी प्रकार की गलत जानकारी से बचें। हमारा अनुभव कहता है कि ऐसी योजनाओं में सक्रिय रहने वाले किसानों को ही सबसे बेहतर मुआवजा मिलता है।

इस परियोजना का सच तो यह है कि यह अलवर की तकदीर बदल सकती है। लेकिन तभी जब जमीन अधिग्रहण पारदर्शी हो, मुआवजा न्यायोचित मिले और किसानों की आवाज को सुना जाए। हमारी टीम इस परियोजना पर लगातार नजर रखे हुए है और आपको हर अपडेट सबसे पहले देती रहेगी।

👉 व्हाट्सएप ग्रुप से जुड़े

👉 इंतजार ख़त्म! MSP खरीद पर सरकार ने दी हरी झंडी, अब किसानों को मिलेगा पूरा भाव





Source link

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *